वन विभाग के मुखिया (HoFF) आर.के. मिश्रा आज सेवानिवृत्त हो रहे हैं। वे अपने साथ उन अनसुलझे प्रश्नों का अंबार छोड़कर जा रहे हैं, जिनसे वे लंबे समय तक पहाड़ की दहाड़ न्यूज़’ डिजिटल एंड पोर्टल चैनल और अन्य मीडिया साथियों को गुमराह करते रहे। उनके पूरे कार्यकाल को देखें तो स्पष्ट है कि वे इन ज्वलंत सवालों से बचकर भाग निकले
1 सवाल चाहे पहाड़ी जनपदों में निरंतर बढ़ते गुलदार के हमलों का हो।

2 सवाल चाहे चकराता में हो रहे अवैध खनन का हो।

3 सवाल चाहे अधिकारियों-कर्मचारियों के साथ हुई मारपीट की घटनाओं का हो।

मैं मुख्य संपादक सुरेंद्र सिंह रावत पहाड़ की दहाड़ न्यूज़ डिजिटल एंड पोर्टल चैनल के माध्यम से यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि आर.के. मिश्रा ने अपने कार्यकाल में न केवल अपने प्रशासनिक उत्तरदायित्वों से पल्ला झाड़ा बल्कि जब भी मैंने इन ज्वलंत मुद्दों पर उनसे स्पष्टीकरण माँगा तो उन्होंने संवाद स्थापित करने के बजाय मुझे दरकिनार करना उचित समझा और अंतत मेरा संपर्क नंबर ही ब्लैकलिस्ट कर दिया। वन विभाग में ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों की एक लंबी श्रृंखला है जो इसी दमनकारी कार्यशैली का अनुसरण करते हैं। जब भी उनसे जनहित में प्रश्न पूछे जाते हैं तो वे पत्रकारों के संपर्क नंबरों को ब्लॉक कर देते हैं ताकि उन्हें सत्य के सम्मुख न आना पड़े।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि सवालों से बचकर निकलना और पत्रकारों को ब्लैकलिस्ट करना केवल उदासीनता नहीं, बल्कि इस बात की ओर इशारा करता है कि आर.के. मिश्रा ने अपने कार्यकाल के दौरान वन विभाग में किसी बड़े भ्रष्टाचार को अंजाम दिया है। यह चुप्पी और सवालों से भागने की प्रवृत्ति उनकी घबराहट और अनैतिक कृत्यों को सिद्ध करती है। मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि आर.के. मिश्रा के हर कृत्य और विफलता की फाइल हमारे पास सुरक्षित है। मैंने विभाग में जो भी पत्र रिसीव कराए हैं, उनकी रिसीविंग कॉपी मेरे पास मौजूद है। ये दस्तावेज अब आने वाले नए HoFF के समक्ष रखे जाएंगे और हम उन पर कानूनी कार्रवाई की कड़ी मांग करेंगे।
उत्तराखंड वन मुखिया आर.के. मिश्रा का पूरा कार्यकाल विवादों और वन विभाग की प्रशासनिक विफलता का प्रतीक रहा है

1 गुलदार का आतंक पहाड़ी जनपदों विशेषकर पौड़ी में गुलदार के निरंतर हमलों में मिल रही जानकारी के अनुसार 16 से 17 नागरिकों ने अपनी जान गंवा दी। स्थानीय जनता लगातार तार फेंसिंग की मांग करती रही, किंतु विभाग खामोश रहा।
2 अवैध खनन चकराता वन प्रभाग में अवैध खनन का वर्चस्व रहा। एसडीओ राजीव नयन नौटियाल द्वारा उठाए गए गंभीर आरोपों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, जिससे खनन माफियाओं का मनोबल बढ़ता रहा।

3 अधिकारी-कर्मचारी उत्पीड़न: कालसी में एसडीओ के साथ हुई मारपीट, आसा रोड़ी वन कार्यालय में तोड़फोड़ और वन कर्मियों पर हमले की घटनाओं ने विभाग की आंतरिक सुरक्षा की पोल खोल दी।
4 बजट और पारदर्शिता: लोकहित से जुड़े बजट और वित्तीय मामलों पर उठने वाले सवालों को सुनियोजित ढंग से दबाया गया जिससे जनता वास्तविकता से अनभिज्ञ रही।
जब उच्च पदस्थ अधिकारी मीडिया के प्रश्नों से बचने के लिए उन्हें ब्लैकलिस्ट करने का मार्ग अपनाएं, तो आम नागरिक की सुनवाई की अपेक्षा किससे की जाए? ऐसे अधिकारियों का वन विभाग जैसे महत्वपूर्ण तंत्र में बने रहना सुशासन के लिए एक गंभीर चुनौती है।
अब जबकि यह पद रिक्त हो रहा है, तो नए HoFF से यह अपेक्षा है कि वे आर.के. मिश्रा की इस उदासीन एवं अपारदर्शी कार्यप्रणाली को त्यागकर विभाग की गरिमा पुनर्स्थापित करेंगे और जनता के प्रति पूर्ण जवाबदेही सुनिश्चित करेंगे।



