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क्या किसान अब सरकारी योजनाओं पर भी भरोसा नहीं कर सकते? उत्तराखंड के किसानों को कागजी नींबू के नाम पर जंगली जामीर थमाए जाने का मामला सामने आया है। इस लापरवाही से न सिर्फ किसानों को भारी नुकसान हुआ, बल्कि सरकार की छवि भी धूमिल हुई। अब कृषि मंत्री गणेश जोशी ने इस प्रकरण में कड़ी कार्रवाई के आदेश दिए हैं।
देहरादून, 15 फरवरी। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में उद्यान विभाग द्वारा वितरित किए गए कागजी नींबू के पौधों में जंगली जामीर निकलने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, राज्य के कृषि मंत्री गणेश जोशी ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2020 में उद्यान विभाग द्वारा किसानों को कागजी नींबू के पौधे वितरित किए गए थे, लेकिन इन पौधों में जंगली जामीर फल निकलने की शिकायतें सामने आईं। मामले की जांच रिपोर्ट में अधिकारियों की लापरवाही उजागर हुई, जिसके चलते किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
जिम्मेदार अधिकारियों पर गिरी गाज
कृषि मंत्री ने प्रेस वार्ता में बताया कि जांच में तत्कालीन संयुक्त निदेशक डॉ. आरके सिंह और उस समय के जिला उद्यान अधिकारी (सेवानिवृत्त) योगेंद्र सिंह चौधरी की लापरवाही सामने आई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, मैसर्स संजीवनी पौधशाला के चयन और पौधों के सत्यापन में भारी अनियमितताएं पाई गईं। इसी के आधार पर मंत्री ने दोनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
कार्रवाई का आदेश जारी
मंत्री के आदेश के बाद कृषि सचिव डॉ. एसएन पांडे ने तत्कालीन संयुक्त निदेशक डॉ. आरके सिंह को आरोप पत्र जारी कर दिया है। वहीं, सेवानिवृत्त जिला उद्यान अधिकारी के मामले में नियमों के अनुसार राज्यपाल की सहमति के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
किसानों के हित सर्वोपरि
कृषि मंत्री गणेश जोशी ने स्पष्ट किया कि किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। उत्तराखंड सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 2003 (संशोधित 2010) के तहत अधिकारियों को 15 दिनों के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।
सरकारी योजनाओं की साख पर सवाल
इस प्रकरण के बाद किसानों के बीच सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। सरकार की ओर से राहत और मुआवजे को लेकर कोई ठोस घोषणा नहीं की गई है। ऐसे में किसानों को अपने नुकसान की भरपाई कैसे मिलेगी, यह अब भी बड़ा सवाल बना हुआ है।



