Monday, February 16, 2026
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गढ़वाल के प्रसिद्ध कलाकार घनानंद का निधन, उत्तराखंड के रंगमंच ने खोया अनमोल रत्न

आप को बता दे

उत्तराखंड की कला अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति, संगीत और नाट्य परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के कलाकार लोकगायन, नृत्य, चित्रकला और रंगमंच के माध्यम से पहाड़ी संस्कृति को जीवंत बनाए रखते हैं। समय-समय पर कई प्रतिभाशाली कलाकारों ने अपनी कला से न केवल राज्य बल्कि पूरे देश में पहचान बनाई है।

उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने वाले कलाकारों में हास्य अभिनेता घनानंद (घन्ना भाई) का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। अपनी अद्वितीय हास्य शैली, सहज अभिनय और लोकसंस्कृति से जुड़ी प्रस्तुतियों के कारण उन्होंने उत्तराखंड के रंगमंच और सिनेमा में अमिट छाप छोड़ी, अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका जाना कला जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

कलात्मक सफर और योगदान
घनानंद का जन्म 1953 में हुआ था और उनकी प्रारंभिक शिक्षा कैंट बोर्ड, लैंसडाउन (जनपद पौड़ी गढ़वाल) में हुई। उनका अभिनय सफर 1970 में रामलीला नाटकों में भाग लेने से शुरू हुआ। इसके बाद 1974 में उन्होंने रेडियो और दूरदर्शन पर अपने कार्यक्रम प्रस्तुत किए, जिससे वे व्यापक रूप से पहचाने जाने लगे।

उन्होंने उत्तराखंड और देशभर के कई मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां दीं और अपनी हास्य प्रतिभा से लोगों को हंसाने के साथ-साथ समाज को भी जागरूक किया। घनानंद ने गढ़वाली और कुमाऊंनी फिल्मों में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं, जिनमें प्रमुख फिल्में “घर जवें,” “चक्रचाल,” “बेटी ब्वारी,” “जीतू बगडवाल,” “सतमंगल्या,” और “ब्वारी हो त यानि” शामिल हैं।

हास्य की दुनिया में ‘घन्ना भाई’ की पहचान
उनकी सुपरहिट फिल्म “घन्ना भाई एम.बी.बी.एस.,” “घन्ना गिरगिट,” और “यमराज” में उनके किरदार को दर्शकों ने खूब सराहा। उनके अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता थी स्थानीय बोली-भाषा का अनोखा मिश्रण, सरल हास्य और सामाजिक मुद्दों पर कटाक्ष, जो उन्हें आम लोगों से जोड़ता था।

निधन और सांस्कृतिक क्षति
घनानंद के निधन से उत्तराखंड की कला और रंगमंच जगत को अपूर्णीय क्षति हुई है। उनकी हास्य प्रतिभा, संवाद अदायगी और मंचीय उपस्थिति को हमेशा याद किया जाएगा। कला जगत और उनके प्रशंसक उन्हें सम्मान के साथ श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं।

अपील:

उत्तराखंड की कला और संस्कृति को जीवंत बनाए रखने के लिए जरूरी है कि नए कलाकार घनानंद जैसे दिग्गजों से प्रेरणा लें और उनकी विरासत को आगे बढ़ाएँ। राज्य सरकार और संबंधित सांस्कृतिक संस्थानों को चाहिए कि वे ऐसे महान कलाकारों के योगदान को सम्मान दें और भविष्य में उत्तराखंड की कला को और आगे ले जाने के प्रयास करें।


 

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