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टीबी से जंग: जागरूकता और जांच पर जोर
क्षय रोग (टीबी) एक गंभीर बीमारी है, जो हर साल लाखों लोगों को प्रभावित करती है। यह संक्रमण मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करता है और समय पर पहचान और इलाज न मिलने पर जानलेवा साबित हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, टीबी के मामले देशभर में लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए भारत सरकार और राज्य सरकारें मिलकर काम कर रही हैं। उत्तराखंड में इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं।
डोर-टू-डोर टीबी जांच के लिए मोबाइल टेस्टिंग वैन की शुरुआत
उत्तराखंड सरकार ने राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम के तहत टीबी रोगियों की पहचान और इलाज के प्रयास तेज कर दिए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, जल्द ही राज्य के पांच मैदानी जिलों में विशेष अभियान चलाया जाएगा, जिसके अंतर्गत डोर-टू-डोर टीबी जांच के लिए मोबाइल टेस्टिंग वैन चलाई जाएंगी। ये वैन मरीजों के बलगम की जांच करेंगी, और जांच में पॉजिटिव पाए जाने वाले रोगियों को तत्काल इलाज से जोड़ा जाएगा।
स्वास्थ्य मंत्री ने साझा किए आंकड़े और योजनाएं
स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने बताया कि उत्तराखंड टीबी उन्मूलन के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में से एक है। उन्होंने कहा कि टीबी जांच और उपचार के लिए पीपीपी मॉडल में मोबाइल ट्यूबरक्लोसिस टेस्टिंग वैन संचालित की जाएंगी। ये वैन हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर, चम्पावत, नैनीताल और देहरादून जिलों के विभिन्न क्षेत्रों में काम करेंगी।
मंत्री ने कहा कि वैन में अत्याधुनिक सीबी नेट मशीन और बलगम जांच की सुविधा होगी। अधिक से अधिक मरीजों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए रूट प्लान तैयार किया जाएगा, और जिलों के मुख्य चिकित्सा अधिकारी नियमित मॉनिटरिंग करेंगे।
टीबी उन्मूलन में उत्तराखंड की उपलब्धियां
स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत उत्तराखंड में अब तक 10,705 “नि:क्षय मित्र” बनाए गए हैं। इनकी सहायता से 23,819 टीबी मरीजों की मदद की गई है, जिनमें से 14,948 मरीज इलाज प्राप्त कर चुके हैं।
इसके अतिरिक्त, उत्तराखंड में 1424 ग्राम पंचायतों के अंतर्गत लगभग 3200 गांवों को टीबी मुक्त घोषित किया जा चुका है। यह राज्य को टीबी मुक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
विशेष कार्यक्रम से टीबी पर नियंत्रण की उम्मीद
सरकार को उम्मीद है कि मोबाइल टेस्टिंग वैन और अन्य प्रयासों से राज्य में टीबी के मामलों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकेगा। इस पहल से न केवल बीमारी की पहचान आसान होगी, बल्कि समय पर इलाज मिलने से रोगियों का जीवन भी सुरक्षित होगा।



