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स्वदेशी नस्ल के संरक्षण में उत्तराखंड की बड़ी उपलब्धि, 100वें स्कौच सम्मेलन में ‘सिल्वर स्कौच’ अवार्ड से सम्मानित
क्या लुप्त होती स्वदेशी नस्लों को बचाने की यह पहल होगी गेम-चेंजर?
भारत में पशुधन अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन तेजी से बदलते कृषि परिदृश्य और विदेशी नस्लों की बढ़ती संख्या के कारण स्वदेशी पशुधन की नस्लें संकट में हैं। देशी नस्लों की घटती संख्या न केवल जैव विविधता के लिए खतरा है, बल्कि यह किसानों की आमदनी और दूध उत्पादन पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। ऐसे में उत्तराखंड पशुपालन विभाग द्वारा संचालित लिंग वर्गीकृत वीर्य उत्पादन परियोजना एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में उभर रही है, जिसे 100वें स्कौच सम्मेलन में ‘सिल्वर स्कौच’ अवार्ड से सम्मानित किया गया।

उत्तराखंड को ‘सिल्वर स्कौच अवार्ड’, स्वदेशी नस्लों के संरक्षण में बड़ा कदम
15 फरवरी 2025 को नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित 100वें स्कौच सम्मेलन में उत्तराखंड पशुधन विकास परिषद, पशुपालन विभाग द्वारा संचालित लिंग वर्गीकृत वीर्य उत्पादन परियोजना को सम्मानित किया गया। इस परियोजना के माध्यम से उत्तराखंड में स्वदेशी नस्ल के पशुओं का संरक्षण किया जा रहा है, जिससे नर पशुओं की संख्या में कमी और 90% से अधिक बछियों के जन्म की संभावना सुनिश्चित हो रही है।
कैसे बदल रही है यह परियोजना पशुधन की तस्वीर?
उत्तराखंड में इस परियोजना की शुरुआत 2018 में राज्य स्तर पर पहली बार की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य लिंग वर्गीकृत वीर्य के माध्यम से अधिकतर मादा बछड़ों का जन्म सुनिश्चित करना है, जिससे राज्य में दुग्ध उत्पादन में वृद्धि हो और किसानों की आय में सुधार हो। आंकड़ों के अनुसार, इस तकनीक के माध्यम से 90% से अधिक बछियां पैदा हो रही हैं, जिससे स्वदेशी नस्लों की संख्या को बढ़ावा मिलेगा और किसानों को आर्थिक लाभ होगा।
सम्मानित हुए अधिकारी, पशुपालन विभाग में हर्ष
इस उपलब्धि के लिए उत्तराखंड पशुधन विकास परिषद प्रशिक्षण केंद्र, पशुलोक ऋषिकेश के संयुक्त निदेशक डॉ. घनश्याम दत्त जोशी ने यह सम्मान प्राप्त किया। पशुपालन सचिव डॉ. पुरुषोत्तम, निदेशक डॉ. नीरज सिंघल, अपर निदेशक डॉ. भूपेंद्र सिंह जंगपांगी और सीईओ डॉ. राकेश नेगी ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त की और इसे उत्तराखंड के पशुपालन क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया।
क्या यह पहल देशभर में अपनाई जाएगी?
स्वदेशी नस्लों के संरक्षण और दुग्ध उत्पादन में वृद्धि की दिशा में यह तकनीक एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। अगर इसे अन्य राज्यों में भी प्रभावी रूप से लागू किया जाए, तो भारत में दुग्ध उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है।



