आप को बता दे
जल जीवन मिशन के तहत हर घर को नल से पानी पहुंचाने की सरकार की महत्वाकांक्षी योजना कई क्षेत्रों में सफल हो रही है। हालांकि, इस योजना के तहत काम करने वाले निचले स्तर के कर्मचारियों को लगातार समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इनमें सबसे गंभीर समस्या वेतन का न मिलना है। ऐसे कर्मचारी जो दिन-रात मेहनत कर योजना को धरातल पर उतारने का कार्य कर रहे हैं, उन्हें लंबे समय से उनका हक नहीं मिला है। करोड़ों रुपये की इस योजना में जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों के साथ उपेक्षा और लापरवाही का व्यवहार किया जा रहा है। उनकी मेहनत का उन्हें सही प्रतिफल और समय पर वेतन नहीं मिलता।
जनपद पौड़ी गढ़वाल के बीरोंखाल ब्लॉक अंतर्गत ग्राम थापला निवासी जल संस्थान के फिटर कर्मी बच्चन सिंह विगत पांच वर्षों से अपनी वेतन के इंतजार में संघर्ष कर रहे हैं लंबे समय से वेतन भुगतान में देरी और प्रशासनिक लापरवाही का सामना कर रहे हैं। इन कर्मचारियों ने छह साल तक पूरी मेहनत से काम किया, लेकिन चार साल की सैलरी मिलने के बाद भी 2019 और 2020 की तनख्वाह आज तक अटकी हुई है। 2020 के बाद से उन्हें कोई वेतन प्राप्त नहीं हुआ है।
पहाड़ के जल संस्थान कर्मियों की दुर्दशा: छह साल काम, दो साल की सैलरी अभी भी लंबित
बच्चन सिंह ने बताया कि उन्हें 2020 में ₹36,000 का चेक जारी किया गया था,पिछले 6 सालों से काम करने के बावजूद केवल 4 साल की ही सैलरी मिली है। साल 2019 और 2020 की सैलरी अब तक लंबित है, जबकि 2019 के लिए जारी चेक की तारीख एक्सपायर हो चुकी है। इसके बाद से उन्हें कोई भुगतान नहीं हुआ। उनके अनुसार, वर्ष 2019 और 2020 के वेतन की कुल राशि ₹84,000 अब भी लंबित है। वेतन ना मिलने के कारण बच्चन सिंह और उनका परिवार गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं।
“घर-घर नल, लेकिन जल नहीं”
मिशन के तहत घर-घर नल लगाने का काम पूरा किया गया, लेकिन कई जगहों पर पानी की आपूर्ति आज भी बाधित है। फिटर कर्मी न केवल नलों की मरम्मत का काम करते हैं, बल्कि पानी के बिल भी इकट्ठा करते हैं। बावजूद इसके, उन्हें अपनी मेहनत की पूरी सैलरी नहीं मिल पा रही है।
लॉकडाउन बना बहाना
कर्मियों का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान बार-बार फोन करने पर भी उन्हें टालमटोल जवाब मिलता रहा। उनकी शिकायतों को सुनने के बजाय प्रशासन ने महामारी का हवाला देकर मामले को दबा दिया।
अधिकारियों से अपील
कर्मियों ने उच्च अधिकारियों और सचिवालय में बैठे निदेशकों से अपील की है कि उनके लंबित वेतन का शीघ्र भुगतान किया जाए। उनका कहना है, “हमने पहाड़ में कठिन परिस्थितियों में काम किया, लेकिन हमारी मेहनत का फल नहीं मिला। अब हमारा गुजारा मुश्किल हो गया है।”
समाधान की माँग
पाँच सालों से लंबित वेतन और प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ इन कर्मियों की आवाज़ अब बुलंद हो रही है। जल जीवन मिशन जैसे करोड़ों की योजनाओं में काम करने वाले निचले स्तर के कर्मचारियों की यह हालत एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करती है, जिसे तत्काल हल करने की आवश्यकता है।



